Tuesday, March 8, 2011

रोजगार Vs हिन्दी


रोजगार  Vs  हिन्दी

पुनीत कुमार

नमस्कार दोस्तों, कैसे हो ? अरे.......... मैं आपसे आपका हाल-चाल पूछ रहा हूँ। लेकिन मैं तो आपको जानता भी नहीं, कौन हो आप ? किधर रहते हो ? आपकी बोली कौन सी हैं ? कोई आपकी राष्ट्र भाषा है भी या नहीं ?
घबराइए मत दोस्तों, यह सवाल मैं आपसे नहीं पूछ रहा हूँ, यह सवाल तो वह शख्स़ आपसे पूछ रहा हैं जो सन् 2025 के पार खड़ा हैं और आपकी इस हालत को देखकर उसने यह सवाल आपसे किए हैं। और यकिन मानिए, अगर आपके पास आज इन सवालों का जवाब नहीं होगा तो उस समय भी नहीं होगा, जब आपसे यह सवाल पूछें जाएंगे।
       अब आप समझ ही गयें होंगे कि मैं आपको किस तरफ़ ले जाना चाहता हूँ। दोस्तों आज हर देश तरक्की पाने के लिए अपनी भाषा को आगे ला रहा हैं। और विदेशी भाषा को ज्ञान के तौर पर रख कर, बाकी सब जगह से नकार रहा है। वह अपनी सभ्यता को दुनिया के हर कोने में ले जाना चाहतें हैं। और ऐसा तभी होगा जब वह अपनी भाषा का विस्तार दुनिया को समझाने में बढाए और उन्हे अपनी भाषा सिखलाए। लेकिन हमारे भारत में, दिखने में सिधी गंगा, उल्टी बह रही है। क्योंकि आज भारत में, चाहे हिन्दी को आगे लाने के लिए कितने ही कदम उठाए जा रहें हो पर सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी के बिना हमारे देश में कोई काम होता ही नहीं। चाहे वह स्कूल, कॉलेज हो या कोई भी रोजगार का क्षेत्र। आज रोजगार पाने के लिए आपकी योग्यता को नहीं देखा जाता, देखा जाता तो बस आपको अंग्रेजी बोलनी आनी चाहिए, इसके बदले में अगर आपको अंग्रेजी पढनी या लिखनी भी न आती हो, तो भी चलेगा। इंसान की परख़ आज उसकी योग्यता और ज्ञान को देखकर नहीं, ब्लकि उसकी अंग्रेजी देखकर की जा रही हैं। अगर कोई अंग्रेजी में बात कर रहा है तो वह पढा-लिखा है अन्यथा वह अनपढ़ समझा जाता है। और सबसे बढ़ी विडम्बना तो यह है कि आखिर हम यह अंग्रेजी बोलकर किसे सुना रहें है, अपने भारतीयो को ? भले ही अंग्रेजो ने हमें आजाद कर दिया हो, लेकिन अपनी गुलामी की जंजीरो की छाप वह आज भी अपनी भाषा के रुप में हमारे पांवो में डाल गये है। जहां हमें कम से कम, अपने देश में तो अपनी भाषा को आगे लाना चाहिए, वहीं हम अंग्रेजी भाषा को प्रयोग करके अपना फैशन स्टेट्स दिखाने में लगे रहते है और हिन्दी भाषा को पिछढ़े समय की पिछढ़ी भाषा मानकर कहीं न कहीं नकारते रहते हैं। और हद तो उन क्षैत्रो में देखी जाती है जहां सारा काम हिन्दी के माघ्यम से होता है और वहां काम करने वाले भी भारतीय ही है, लेकिन साक्षात्कार के समय आपको अंग्रेजी आनी जरूर चाहिए, क्योंकि उन बेचारों को लगता है कि भारतीयों को अब हिन्दी बोलना ही पसन्द नहीं है और भाई उन्हें भी तो फैश़न के साथ चलना है न।
      किसी भाषा को अगर हम ज्ञान के तौर पर सीख रहें है तो यह अच्छी बात है लेकिन दुख की बात तो यह है कि हमें अपने ही देश में, अपने ही भारतीयों के सामने पेट की भूख मिटाने के लिए, अंग्रेजी में रोजगार मांगना पङ रहा हैं। और हमें न चाहते हुए भी अंग्रेजी पर निर्भर रहना पङता हैं।
       और तो और हमारें देश के निचलें राज्यों का तो हिन्दी को लेकर बहुत ही बुरा हाल है, खासकर तमिलनाङु में तो सन् 1996 से लेकर अब तक सरकारी तौर पर हिन्दी पर प्रतिबंध लगाया हुआ है और तमिल व अंग्रेजी को सरकारी तौर पर मान्यता प्रदान की गई है। अगर यहां पर सिर्फ उनकी मातृभाषा का सवाल होता तो ठीक था लेकिन वह हमारी राष्ट्रभाषा को त्याग कर किसी विदेशी भाषा को अपना रहें है। यह बङी दुख की बात है। क्योंकि जब हमारे ही देश में, हमारी ही राष्ट्रभाषा की इज्जत नहीं है तो विदेशों में इसके विस्तार की क्या उम्मीद की जा सकती है।
       इन बातों को सोच-सोच कर मुझे एक महान महात्मा की बात रह-रह कर याद आ रहीं है कि वह सपना कब पूरा होगा जब भारत के हर इंसान की रोजी-रोटी हिन्दी-माध्यम के द्धारा ही चल निकलेगीं।
               तो चलो दोस्तों, अब मैं चलता हूँ.............अरे.............अरे............वोह भूला........एक बात तो मैं कहना ही भूल गया, आप यह सोच रहे होगें कि यह लेखक इस लेख में तो हिन्दी की बात कर रहा है लेकिन इसने अपने शिर्षक में अंग्रेजी(vs.) शब्द का प्रयोग किया हुआ है। तो दोस्तों आज सच्चाई यह हैं कि रोजगार और हिन्दी के बिच़ में अंग्रेजी आ गई है। नमस्कार........................    

Tuesday, February 22, 2011

शब्दों में क्या रखा है यारों !/ पुनित कुमार




शब्दों में क्या रखा है यारों !

      जी हां दोस्तों, ज्यादातर लोगों का मानना हैं कि इंसान की परख़ उसके कपड़ो से, उसके चेहरे से, उसकी चाल से व उसके व्यवहार से की जाती है, इंसान के सही व गलत होने का ढंग यह लोग इन्ही चीजों को देखकर करते है। और यह वह लोग है जो यह मानते है कि इंसान की दृश्य चीजों में ही इंसान की फ़ितरत बसी है और इंसान की अदृश्य चीजें जैसे कि मुँह से निकलने वाले शब्दों में आखिर कुछ नहीं रखा है। जो कुछ रखा है वह है, इंसान के हाव-भाव व उसकी नज़र में। क्योंकि इंसान के हाव-भाव व नज़र उसकी बहुत सी ऐसी चीजें कह डालती है जिन्हें मुँह से निकालने में बहुत से लोगों को परेशानी होती हैं। और इनमें सबसे ज्यादा इंसान वह प्रेमी युगल है जो बिना बोले अपनी आँखो से एक-दूसरे से बहुत सी बातें बोल जाते है।
         
       लेकिन इन बिना बोले शब्दों को सुनकर मेरा मतलब देखकर, नहीं सुनकर, नहीं देखकर............छोड़ो न यार शब्दों में क्या रखा है। तो क्या कह रहा था में.........हाँ, इन बिना बोले शब्दों को सुनकर-देखकर हम कई बार गलतफेमी का शिकार हो जाते है। जैसे कि सामने वाला हमें जान-पहचान की नज़रों से देख रहा होता है, लेकिन हम उसका गलत मतलब ले जाते है।
          यह तो रहीं बिना बोले शब्दों की बात, लेकिन मुँह से निकलने वाले शब्दों की भी अपनी ही कुछ अलग परेशानियाँ है। अगर इन शब्दों को हम तोल-मोल कर न बोले तो बात का मतलब़ कुछ का कुछ निकल जाता है। इस बात को एक खुबसूरत उदाहरण के साथ समझाता हूँ। एक बार स्वामी विवेकानंद अमेरिका की एक जनसभा में ईश्वर की महिमा के बारे में लोगों को बता रहें थे। और शब्दों की महत्तवता की बात छेड़ते ही एक व्यक्ति ने अपने विचार प्रकट किए की आखिर गुरु जी, इन शब्दों में क्या रखा है? इसलिए आप यहाँ पर कुछ भी बोल सकते हो जब विवेकानंद की बारी आई तो उन्होनें उस व्यक्ति की तरफ़ इशारा करते कहा कि आप मूर्ख है, अनपढ़ है, नासमझ हैयह सब सुनते ही वह व्यक्ति गुस्से में आ गया और बोला आप जैसे महापुरुष की वाणि ऐसी होगी मैनें कभी सोचा न था, आपके इन शब्दों से मुझे बहुत दुख़ पहुँचा हैं। इस पर विवेकानंद ने कहा कि, न ही मैनें आपको गाली दी है और न ही मैनें आपको पत्थर मारे, मैनें तो बस शब्दों के वाण ही फ़ैके है। अरे अभी-अभी तो आपने कहा था कि आखिर इन शब्दों में रखा क्या हैअब विवेकानंद ने बड़े शांत स्वभाव से कहा कि जिस शब्द से कोई आहत हो जाए, ऐसे शब्दों को बोलने से पहले हमें यह सोच लेना चाहिए कि इसका परिणाम क्या होगा? रहीम ने भी कहा है कि, जिंह्आ जब बोलती है तो यह आकाश-पाताल नहीं सोचती, सच तो यह है कि कुछ भी बोल जाती है हमारी यह जिंह्आ
               

        दरअसल, एक कटु सच यह भी है कि हम जैसा सोचते है, हमारा व्यवहार भी वैसा ही होता चला जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि आप अपने जेहन में यह बात बैठा लें कि आप में योग्यता नहीं है व आप कभी भी क्रिएटिव नहीं बन सकते है, तो भविष्य में इसकी पूरी सभांवना है कि आप में कभी भी योगयता न आए व आप कभी भी क्रिएटिव न बन पाए। दूसरी तरफ, अगर आप खुद को लगातार यह कहते व समझाते रहें कि आप योग्य है व आप क्रिएटिवहै तो एक न एक दिन इसकी पूरी संभावना है कि आप में क्रिएटिवीटीयोग्यता जरुर आ जाएगी। याद रखें, यदि आप अपना आकलन हारे हुए खिलाड़ी के रुप में करेंगे तो, ऐसी स्थिति में आपकी सोच एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह ही हो जाएगी और फिर इसी की बदौलत आपका व्यक्तित्व भी आगे बढ़ेगा। दरअसल हम उन्हीं बातों में ज्यादा विश्वास करते है, जिन्हें हम बार-बार दोहराते रहते हैं। यदि आप अपने बारे में पॉजिटिव बातें करते है तो यही बातें आपको धीरे-धीरे सकारात्मक विचारों वाला व्यक्ति बना देते है। अब यदि आप दिन भर नकारात्मक बातें करते रहेंगे तो वही बातें आपको नकारात्मक विचारो वाला व्यक्ति बनने पर मजबूर कर देंगी। यही कारण है कि हमें सकारात्मक व नकारात्मक शब्दरुपी हथियारों का इस्तेमाल बड़े सोच-समझकर करना चाहिए। दोस्तों अगर आप हर रोज नकारात्मक अर्थ वाले शब्दों को प्रयोग करते है तो आज से ही सकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करना शुरु कर दें। फ़िर यकिन किजिए दोस्तों एक न एक दिन कामयाबी आपके कद़म जरुर चूमेंगी।     
PUNEET KUMAR
             (puneettopuneet@gmail.com)


Monday, February 14, 2011

अघर में बच्चों का भविष्य





अघर में बच्चों का भविष्य
पुनित कुमार
    
 नमस्कार प्रिय दोस्तों, मुबारक हो आप सभी को क्योंकि हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। हमारे भारत ने इन 64 वर्षो में जितनी तरक्की की है, ये तो आप अच्छी तरह से जानते है। राज्यों-राज्यों में जगह-जगह आज हमें आघुनिकरण होता दिखाई देता है। कोई मेट्रो बना रहा है, तो कोई हमारे खिलाड़यों के लिए स्टेडियम, तो कोई दुनिया की सबसे ऊँची बिल्डिंग भारत के अंदर बनाने का सपना देख रहा हैं, तो कोई आम जनता के लिए सस्ती कारों का निर्माण कर चुका है। दोस्तों यह तो रही सिक्के के एक पहलू की बात, चलिए सिक्के के दूसरे पहलू को देखते हैं। कोई मँहगाई बढ़ाने में लगा हुआ है तो कोई पेट्रोल-डिजल के दाम, तो कोई खाने-पीने के समान को मँहगा कर रहा है तो कोई घुमने-फ़िरने के लिए परिवहन को, तो कोई शिक्षा में सुघार करके उसे आघुनिक बनाने में लगा हुआ है, जिससे हमारे देश के बच्चें आगे चलकर हमारे देश की बागड़ोर सम्भाल सकें। लेकिन क्या आपको वाकई यह लगता है कि हमारे देश की शिक्षा का स्तर इतना बड़ रहा है की हमारे देश के बच्चें अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें।
 
दोस्तों आज भी ज्यादातर सरकारी स्कूलों में पांचवी कक्षा के बाद ही अंग्रेजी विषय को पढ़ाया जाता है और शिक्षा का ज्यादातर अध्धयन हिन्दी माघ्यम के द्धारा से ही होता है, जिसकी वजह से वह बच्चा प्राईवेट स्कूलों के मुकाबले अंग्रेजी विषय में बहुत पिछे हो जाता है और वह उतनी अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल पाता जितनी की एक प्राईवेट स्कूल का बच्चा बोलता है। और वह बच्चा अपनी इस कमी के कारण हर जगह अलग से पहचान में आने लगता है, चाहे वह स्कूल हो, कॉलेज हो या कोई नौकरी की जगह। इसलिए इन बच्चों को तरक्की की राह में एक ऊँचा मुकाम हासिल करने में बहुत समय लग जाता है। अब आप सोच रहें होंगे कि यह तो अच्छी बात है न कि सरकारी स्कूलों के बच्चों को अग्रेंजी माघ्यम में ज्यादा न पढ़ाकर राष्ट्र भाषा हिन्दी में ज्यादा जोर देकर पढ़ाया जाता है, लेकिन जनाब जब पूरे देश की रोटी अंग्रेजी माघ्यम के द्धारा चलने की कग़ार पर आ रही है तो इन बेचारों को भी तो अपना और अपने परिवार का पेट भरना है ना।

यह बात तो रही भाषा-विषय की, चलिए अब एक नज़र डालते है बच्चों के व्यवहार-अघ्ययन पर। आज कल आपको सुबह व दोपहर के टाईम पर अनेकों ऐसे स्कूल के बच्चें दिख जाएंगे जो कि स्कूल से बंक(स्कूली भाषा) मारकर कहीं पार्क में बैठकर जुआ खेलते हैं या तो कहीं बस-स्टैंण्ड पर बैठकर लड़कियो को छेड़ते हैं। कोई बच्चा सिगरेट पी रहा होता है तो कोई फ़्लूड के नशे में मस्त हो रहा होता है। और तो और आजकल की स्कूल की बच्चियाँ भी अपने से बड़े किसी नौजवान के साथ इश़्क लड़ाती हुई आपको किसी पार्क में नज़र आ जाएगी। इन बच्चों को न तो अपने भविष्य से मतलब है और न ही अपने माँ-बाप की उम्मिदों से। यह बच्चें ज्यादातर सरकारी स्कूलों के होते है, जिन्हे न कोई शिक्षक काबू कर पाता है और न ही उनके माँ-बाप। सरकारी स्कूलों के अघ्यापकों को तो इतनी सूघ भी नहीं होती है कि वह यह जान सकें की उनके स्कूल के बच्चें कहीं बुरी-संगत में पढ़कर, जुर्म की दुनिया में तरक्की जोरों से कर रहें है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस बुरी-संगत का कीड़ा सिर्फ सरकारी स्कूल के बच्चों को लगा है, प्राईवेट स्कूल के बच्चें तो इनसे भी आगे बढ़ गए है। अगर सरकारी स्कूल के बच्चें इन बुरी-संगतों का पहला चरण सिख रहें है तो प्राईवेट स्कूल के बच्चें तो यह चरण पार करके भी बहुत आगे बढ़ गए है। कहने का मतलब यह है कि भले ही प्राईवेट स्कूलों के बच्चें स्कूलों से न भागते हो और न ही स्कूल के टाईम पर आपको कहीं बुरा काम करते हुए दिखाई देते हो, लेकिन पुलिस रिकार्ड के अनुसार ज्यादातर अपराघिक गतिविधियों में यह प्राईवेट स्कूल के बच्चें ही होते है।

अब सोचने वाली बात तो यह है कि हम इन बच्चों को कैसा भविष्य दे रहे हैं, और कैसे इन बच्चों को बुरी-संगत और अपराधिक गतिविधियों से बचाए, जिससे की आगे चलकर यह बच्चें देश का और अपने माँ-बाप का नाम रोशन करें। आजकल हर कोई अपनी गलती एक-दूसरे पर डालकर छिपता हुआ सा नज़र आ रहा हैं। माँ-बाप, स्कूल और अध्यापकों को जिम्मेदार ठहरातें है तो स्कूल माँ-बाप को, और अध्यापक, सरकार और माँ-बाप दोनो को। हर कोई एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने पर लगा हुआ है, लेकिन कोई भी अपने अंदर झांक पाने की हिम्मत नहीं दिखा पाता है कि हमसे ऐसी कोन सी गलती हो रही है, जो यह बच्चें बुरी-संगत में पड़कर अपराध कर रहे हैं।

और ऐसे ही होता रहा तो हमारे देश का भविष्य जल्दी ही खत्म हो जाएगा और बाद में हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। तो इसलिए दोस्तों दूसरों में गलतियाँ निकालने की वजह अब अपने में गलतियाँ ढूँढो और अब सोचने का नहीं कदम उठाने का वक्त आ गया है.........................प्रणाम
2/12/2011           

Saturday, December 25, 2010

HEY WANTS! A TONNING AND FIRMING BODY

HEY WANTS! A TONNING AND FIRMING BODY
   
     There are quite a number of programs for weight loses and abs toning and firming that do not give you the truth all the time. Some of these programs are full of hype and false promises that are very ineffective. A person who seeks to lose a lot of weight and develop firm abs should look into a Truth about six pack abs review just to get a glimpse that not all promises are intended to be broken. As a matter of fact, these reviews were intended to help you in finding solutions to maintain your body to stay fit and lead you in the right ways to lose weights. “Toning and firming.” You can gain or lose fat and you can gain or lose muscle. That's it. Those are essentially your choices based on biological reality. Now, if you lose some fat and gain some muscle, you will be more “toned” in appearance and “firm” to the touch, but the body does not know from toning and firming, and that's a fact. Thus, your goal should be to lose fat (not just weight!) and gain muscle. People who focus on weight loss only often end up a smaller version of their former selves, flabby and with high body fat levels. They are neither “toned” in appearance or “firm” to the touch. Why? Because they made the mistake of focusing on the wrong goals of weight loss and “toning and firming” versus what actually matters: losing fat and gaining muscle.
    Telling people they need to lose fat and gain muscle to achieve the body they want does not sell diets, supplements, and exercise programs to people; it's not catchy or sexy, but the generic term “toning and firming” sounds perfect for selling all of the above.  Many people ask me many times..What is “Toning” real means? So I tell that “Tone” is nothing more than resting tension in a relaxed muscle.  People ask: Aren’t you supposed to cut up your muscles with ultra-high reps and super ‘burn’?” To that I give an emphatic “No.” The ‘burn you feel from high reps is from lactic acid buildup and does absolutely nothing for toning up your muscles. Pick up a copy of the Guinness Book of World Records, and look up the picture of Captain America, who holds the world record of the most consecutive sit-ups. It’s in the ball park of 25 000! This guy must have felt “the burn” more than anyone else on this planet, and he does not even have a six-pack to show for it, even at his low level of body fat. Let me further explain: The reason you feel hard during and after “the burn” is the same reason a corpse is stiff - ATP depletion. Your muscle fibers are like mouse-traps - they go off by themselves, but need energy to be reset to contract again. A dead body is out of ATP, the energy compound that relaxes the muscles. A “stiff’s” muscles are permanently contracted. A high-rep workout exhausts ATP in your muscles and leads to temporary hardness, unlike the   rigormortis! The only way to make this type of tone LAST is by killing yourself!

   REAL tone is residual tension in a relaxed muscle. This kind of tension comes from intense muscle contractions, and not merely energy exhaustion. Strength = Tension = Tone. It is that simple. Power and definition training is the same thing.
Millions of women these days ask “Why am I having trouble getting buns of steel?” the answer is that our gluts have tremendous strength and leverage. When you see a power-lifter squat or dead lift bar-bending weight, their gluts carry the brunt of that multi-hundred pound load! When you do butt squeezes or similar silly moves popular in “muscle sculpting” classes, you do not even come close to tapping the force/tension potential of your body’s strongest muscles. You’d better get on a first-name basis with heavy deads if you are after a hard butt! Besides exercising you must learn to eat the proper foods that will assist you in strengthening your body and make you lose all the fats while boosting the 6 pack abs all at the same time. Beware of the exercises recommended by others. They might be using special apparatus to boost the abs. If you do the exercises erroneously you will just end up reinforcing the abs but not for those 6 pack abs. The right exercises must be done to make you lose ponds and develop the abs all together.
So friends take this seriously and enjoy your “TONING and FIRMING” Body…and one thing you remind always that “No pain, without pains”...




Wednesday, December 22, 2010

WHAT! WEIGHT LOSE WITH TEA


WHAT! WEIGHT LOSE WITH TEAS

           HELP HELP……….somebody help me...I m stuck in unhealthy body...Please help me...I have no idea that how I make my body healthy and how I earn my body real wealth…
          So friends afraid...Don’t worry this is not you and me...But probably this man within us…because we are not properly concentrate our health. Hence friends I dedicated this article for those human who are conscious for our health...Please read them seriously…
           Slimming tea is a refreshing beverage, which has been used as a method for burning fat and losing weight. It has been a popular drink in the orient and the dieting qualities are catching on in America as well. Today there is still much research being done to unlock the mysteries about the benefits of slimming tea. It can be purchased in grocery stores, herb stores, specialty shops or many websites online. Teas can vary vastly in price and this does not mean that the most expensive is the only one that can work for weight loss.
          When selecting a slimming tea look for an oolong tea or loose leaf green tea that you find affordable. Study the labels of products to make sure they do not have additives that you are unfamiliar with or could be dangerous. To benefit from this tea you should drink a cup twice a day. This will be plenty to supply you with the benefits of minerals and antioxidants to aid in weight reduction. Drinking more tea than the required two cups is not necessary and will not provide any additional benefits for losing weight. What effects does drinking slimming tea have on the body? It helps to have a bowel movement, which can relieve that full bloated feeling. In essence it almost works as a cleanse giving you a fresh start on a new diet. Some teas are said to promote increased metabolism and work at suppressing appetite.
            Drinking a couple of cups of hot tea everyday will help to fill you up especially if taken right before a meal. Tea can also work as a natural diuretic with the addition of liquid in the diet.
            Much of the teas on the market come from China where they respect the value of a good cup of tea on a daily basis and believe in it for maintaining good health. Popular teas include 3 Ballerina Dieter’s Drink, Smooth Move tea and Feiyan tea. Many of the teas are made with an ingredient called Senna. The ground up leaves and pods are considered a strong laxative that relieves bloating and help to cleanse.
             Whether you just enjoy a good cup of tea or wish to use slimming teas in conjunction with a diet, they can provide a healthy refreshing beverage. Those looking for weight loss with slimming teas still need to change eating habits for the better and incorporate exercise as part of their lifestyle.

Saturday, December 18, 2010

मिल गया :- भिषावृति का उपाय/पुनित कुमार


मिल गया :- भिषावृति का उपाय/पुनित कुमार
नमस्कार दोस्तों, कैसे हो आप, सब घर में ठीक-ठाक, काम काज़ कैसा चल रहा हैं, मज़ा में? चलो मैं तो, यहीं दुआ मांग रहा हूँ कि आप ऐसे ही फ़ले-फूलें और आपके घर में वह हर समान हो, जो एक समृद्ध जीवन जीने के लिए एक इंसान को चाहिए होता हैं।
   लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जब हम तरक्की करते हुए एक मुकाम पर पहुँच जाते है तो हम उन लोगों की कितनी मदद करते हैं, जो बेचारे पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी, अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम भी नहीं कर पाते हैं।
    नहीं समझे, चिंता मत किजिए घीरे-घीरे सब समझ में आ जाएगा कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।
एक दिन मैनें एक मॉल में देखा कि, एक लम्बी सी कार में एक सज्जन सूट-पैंट पहन कर निकलता है। सर्दी का दिन था और वह पूरी तरह से गर्म कपड़े पहने हुए था। वह एक रेस्टोरेंट में गया और उसने वहां सबसे मंहगे खाने का ऑर्डर दिया। यह सब वहीं मॉल के बाहर एक कोने में बैठा गरीब भीखारी देख रहा था। जिसके पास बदन ढकने के लिए सिर्फ एक घोती थी। उसकी आँखे ऐसे घसी हुई थी कि मानो की वह अंदर की तरफ़ देख रहा हो, दोनो गाल एक दूसरे से मिलने के लिए सिर्फ कुछ फ़ासले पर थे। उसके बदन की खाल, पानी और खाना न मिल पाने को कारण ऐसी सिकुड़ गई थी, जैसे कोई सुखी किशमिश हो। वह उस सज्जन को खाते हुए, बड़ी भूखी और प्यासी निगाहों से देख रहा था। अचानक उस सज्जन की नज़र उस भिखारी पर पड़ी और सज्जन ने उस भिखारी से ऐसे मुँह फेर लिया, जैसे वह उसका कोई जानी-दुश्मन हो। थोड़ी देर में जब उस सज्जन का मन भर गया तो उसने वह बचा हुआ खाना कूड़े के ढ़ेर में फेंक दिया और वह अपनी लम्बी कार में चल दिया। उसके जाने के बाद, जल्दी से उस भिखारी ने कूड़े के डिब्बे से वह खाना निकाला और खा लिया।
       तब मेरी समझ में आया कि भूखइंसान को खाने की इज्ज़त करना कैसे सिखा देती है। असल में हमें कभी असली भूख का एहसास होता ही नहीं क्योंकी हमें थोडी सी भी भूख लगते ही हमारे पास खाना आ जाता है। ठण्ड लगते ही, हमें गर्म कपड़े मिल जाते है। बरसात या घूप होते ही, हमारे पास सर छुपाने के लिए घर होता हैं। लेकिन उन गरीब और निर्घनो का क्या, जो सड़क पर रहने के लिए मजबूर है और जो न चाहते हुए भी आगे चल कर भिखारी बन जाते हैं।

      आपने देखा होगा की पूरे भारत में खासकर दिल्ली और मुम्बई में भिखारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। राज्य सरकार इन भिखारीयों को कम करने की जगह आपस में लड़ रही है कि ये आपके राज्य के है, हमारे के नहीं। हम सब चाहते है कि हमारे देश से भिखारी कम हो जाए और इन्हे हमारे जैसा रहन-सहन मिलें। और इस भिषावृती का हल निकलें।
      जब इस समस्या का हल बड़े-बड़े ज्ञानी नहीं दे पाए तो, हारकर मैंने एक भिखारी से ही इसका समाघान पूछ लिया और कहा :- “आखिर भाई तुम चाहते क्या हो, तुम्हारे लिए इतना करने के बाद भी तुम बढ़ते क्यो जा रहें हो”?
      तब उस भिखारी ने मंद-मंद मुस्करा के कहा :- “ अच्छा बेटा पहले यह बताओ, हमारे देश की आबादी कितनी होंगी”?
 मैंने कहा:- होगी एक अरब के आस-पास
  भिखारी :- “और इनमें घर कितने होगें”?
        “होंगे करोड़ो के आस-पास
भिखारी :- “और हमारे देश में भिखारी कितने होंगे”?
          “होगें लगभग 5-6 लाख के करीब
मैं उसकी बात समझ नहीं पा रहा था और मैंने उससे पूछ ही लिया :-“आखिर तुम कहना क्या चाहते हो
तब वह बोला :- “बेटा अगर देश का हर इंसान अपना जीवन सादगी में बिताएं और हम गरीब-निर्घन लोगों को आपस में बाँट ले, हमें काम देदे तो। आने वाले कुछ सालों में हमारे देश में कोई भी नया भिखारी पैदा नहीं होगा, और यह भिषावृती हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी
      उसकी बात मेरी समझ में नहीं आई। मुझे लगा कि हम सब पागल है क्या, जो इन भिखारियों को आपस में बाँटगे और इन्हे काम देंगे। हम अपनी कमाई हुई दौलत को इन भिखारीयों में लूटा दे, बिल्कुल नहीं।
       इन्हीं सवालों से घिर कर मैं अपने घर आ गया। मैं अपने घर इतने सालों से रह रहा हूँ, लेकिन आज मुझे अपना घर कुछ अन्जाना सा लग रहा था। मुझे अपना घर अब जरुरत से ज्यादा बड़ा लगने लगा था।
    इस देश में ऐसे भी कई घर हैं, जहाँ एक-एक कमरें में दस-दस लोग रहते है और ऐसे भी कई रईसजादें है जो बड़े-बड़े कमरों में अकेलें रहते है। ऐसे भी कई लोग है, जो रोज किसी न किसी भाने से बहुत सारा खाना फ़ेकते है और ऐसे भी कई लोग है, जो दो वक्त की रोटी के लिए तरस जाते हैं और भूखे ही सो जाते हैं।
   यह बात में सोच ही रहा था कि अचानक मेरे दोस्त का फोन आ गया और बातों-बातों में मैंने उसे इन बातों के बारे में भी बताया, यह सुनुने के बाद उसने मुझे बताया कि वह एक ऐसे रिक्शे वाले को जानता हैं, जिसने सड़क पर भीख माँगने वाले, 3 बच्चों को गोद ले रखा है और वह अपनी पूरे दिन की जिविका को इनके पालन-पोषण में लगा देता हैं।
     यह बात सुनकर मेरी आँख खुल गई कि वह रिक्शेवाला इतना गरीब होकर भी 3 भिखारीयों का बोझ उठा सकता है, तो हम कम से कम एक भिखारी का तों बोझ उठा कर, उसे काम पर लगा ही सकते है। अब रह-रहकर मुझे उस बूढ़े भिखारी की बात याद आ रहीं थीं की अगर हम सादगी भरा जीवन जिए और एक-एक भिखारी को आपस में बाँट कर,उन्हे काम पर लगवा देते हैं तो, जल्द ही हमारे देश से भिषावृति का नाम मिट जाएगा
            तो दोस्तों, आज से ही यह संकल्प कर लो कि सरकार के भरोसे न बैठकर, अब हम यह कदम खुद उठाएंगे और इस भिषावृति को जड़ से खत्म कर देंगें।  

पुनित कुमार